
मन था कि कह दूं, टेस्ट कराने में चार हजार खर्चने के बाद तो दो दिन से नींद ही नहीं आ रही! फिर भी अंदाजन कहा, यही कोई छ:-साढे छ: बजे। थोडा जल्दी सोया करें और सुबह 4 से 5 के बीच उठकर कसरत वगैरह किया करें।
जी.. मैंने समर्थन में सिर हिलाया। वैसे इस उम्र में योगा करना बेहतर है। जी.. मेरी नजरों में उनकी जड से आधी सफेद आधी काली खिजाबी मूंछें चुभ गई। आपको फलों का रस और हरी पत्तेदार सब्िजयां लेनी चाहिए।
मैं हतप्रभ था। मैं सोचने लगा-मैं तो वर्षो से ऐसा ही था, एकदम फिक्स्ड वेट। दो-चार सौ ग्राम कम या ज्यादा। चार हजार के टेस्ट गए पानी में। जेब भी अंडरवेट यानी हलकी हो गई। डॉक्टर कहता है कुछ नहीं! मैंने क्रोध और हताशा की मिली-जुली मुद्रा में डॉक्टर को देखा। उनकी सींकिया बॉडी वर्षो से ऐसी ही थी, वैसे डॉक्टर साब, अंडरवेट तो आप भी हैं, मेरी जुबान से यह जवाब फूट पडा।
हें-हें..वो..क्या है कि मेरी तबीयत जरा ठीक नहीं रहती, डॉक्टर का यह उत्तर सुनकर मुझे लगा उनके उपदेश उन्हें ही दोहरा दूं। परंतु क्या करता! पर उपदेश कुशल बहुतेरे। ख्ौर। उपदेश देना सबको अच्छा लगता है। यूं तो मैं बचपन से उपदेशी जीव रहा। उपदेश देना हमें खूब आता है। यह एक आसान काम है, लेकिन ये सबके बस की बात नहीं। यह काम जोखिम भरा है। कई धर्मग्रंथ उपदेशों से भरे पडे हैं-हे मेरे पुत्र मेरी शिक्षा को न भूलना। अपने हृदय में मेरे उपदेशों को रखे रहना। ऐसा करने से तेरी आयु बढेगी और तू कुशल से रहेगा। कृपा और सच्चाई तुझसे अलग न होने पाए, वरन उनको अपने गले का हार बनाना। तो तू परमेश्वर और मनुष्य दोनों का अनुग्रह पाएगा। तू अति बुद्धिमान होगा।
हम मनुष्य प्रजाति के तथाकथित पुत्र ज्यादा बुद्धिमान निकले। उस महान उपदेशक को हमारे पापों के लिए सूली पर चढा दिया गया। इसलिए मैं कहता हूं कि यह काम जोखिम भरा है। क्योंकि सुनने वाले की उपस्थिति इसकी पहली शर्त है। उपदेशों को सुनने वाला चाहिए। उपदेश दीवारों को नहीं दिए जाते। इसलिए उपदेश देना एक आसान, किंतु जोखिम भरा काम है।
उपदेशक को यह जान लेना चाहिए कि सामने वाला सुनने को तैयार है या नहीं। सुनने के लिए धैर्य चाहिए। आज धैर्य की बेहद कमी है। वैसे लाचारी भी आदमी को धैर्यवान बनाती है। इसलिए अपने से कमजोरों को उपदेश देना प्रचलन में है। अधिकारी अपने अधीनस्थों को समय पर डयूटी पर आने का उपदेश देता है और खुद समय को गुलाम समझता है।
शर्मा जी मेरे अभिन्न मित्र हैं। एक दिन वह नए पडोसी से झगड पडे। पहलवाननुमा पडोसी गरजता हुआ बाहर आया तो उसका यह रूप देखते ही मेरे मित्र की हालत खराब हो गई। उन्होंने मेरा हाथ पकडते हुए मुझे ही उपदेश देना शुरू कर दिया, अरे छोडो भी, ऐसे लोगों के मुंह क्या लगना। सभ्यता भी कोई चीज होती है। झगडा तो हम भी कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करना शोभा नहीं देता।
उनकी दीनता ने उन्हें उपदेशक बना दिया था। तथापि उपदेश देने वाला उपदेश देता तभी है जब उसका फायदा हो। फायदे की दुनिया है। उपदेश देने से अपना उल्लू सीधा होता हो तो क्या बात है। किंतु दूसरे का फायदा! किसी को बर्दाश्त नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूं-इस काम में बहुत खतरा है, सिर फुटौवल के लिए तैयार हो तो उपदेश दो। अब इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए उपदेशों को लिख देने का तरीका निकाल लिया गया है। हितोपदेश की कथाएं आज भी दिशा दे रही हैं। अब उपदेश देना आत्मघाती है, इसलिए लिखकर रख दो बाकी पढने वाले की मर्जी।
बावजूद इसके परंपरागत तरीके से यानी आमने-सामने होकर उपदेश देना अभी चलन से बाहर नहीं हुआ है। अभी भी लोग यह जोिखम मोल ले लेते हैं। इस भीषण कलियुग में उपदेश देने की सनातन परंपरा जीवित है। बस जरा स्वरूप का फर्कहै। जोखिम उठाने के लिए हथियारों से लैस होना पडता है। श्री राम धनुष-बाण लेकर वन को गए। कृष्ण ने चक्र धरा। आज के उपदेशी जीव उपदेशों से कमा खा रहे हैं। अंगरक्षक उनकी निगरानी करते हैं। उनके उपदेशों को सुनने के लिए लोग हजारों रुपये खर्च करते हैं। माया महाठगिनि हम जानी.. यह उपदेश देने वाले करोडों में खेल रहे हैं। अर्थ के लिए ही उपदेश देना एक कला के रूप में विकसित हो रहा है। सच पूछिए तो कुशलता से उपदेश देना किसी कला से कमतर नहीं। आज नई पीढी के कुछ लोग बाकायदा इसकी शिक्षा-दीक्षा दे रहे हैं। वरना स्थिति तो यह है कि उपदेश तो क्या, आजकल आम बात तक किसी की कोई सुनना नहीं चाहता। युवा बेटा सीना तानकर बाप से कह देता है कि आप बात-बात पर उपदेश न दिया करें। जमाना बदल गया है, खुद को बदलें। फिल्म दर्शकों ने उपदेश देने वाली फिल्मों को नकार दिया-क्या वही सडी-गली बातें। सच बोलो, दूसरे को तकलीफ मत दो, कर भला तो हो भला। छि:।
उपदेशक फिल्में बेअसर हो रही हैं। अब सच्चे उपदेशों का असर नहीं होता। कथनी और करनी के फर्क से असर जाता रहा। कहा हुआ करना अब आउट ऑफ फैशन हो चुका है। कहो कुछ भी, पर करो वह जो मन पडे। कवि नईम के शब्दों में-
प्रश्न चिह्न क्यों लगा रहे, कथनी-करनी पर
अरे..अरे..अंकल जी गिर पडे..दौडो-दौडो आसपास के लोग दया भाव दिखाते हुए दौड पडे। मुझे अंदरूनी चोटें आई थीं। लोगों ने मुझे उठाया। मैं घबरा गया था। अपने आपको किसी तरह संभाला। स्कूटर न चलने की स्थिति में आ गया था। अत: गुस्सा दिखाते हुए कहा, कैसे गाडी चलाते हो। इतनी तेज। और वो भी रॉन्ग साइड। कुछ तो ध्यान करो। रोड पर चलने के कुछ नियम हैं। अरे जीवन के कुछ साल और बचे हैं..जी लेने दो।
नौजवान मोटरसाइकिल सवार रितिक रोशन की तरह कंधे उछालते हुए खडा हुआ। फिर मोटरसाइकिल पर किक जमाते हुए दम दे डाली, ठीक है..ठीक है, ज्यादा उपदेश झाडने की जरूरत नहीं। मर तो नहीं गए न। ये कहो बच गए। चलो निकल लो। मैं औंधे मुंह पडे स्कूटर देखता रह गया। वह फुर्र हो गया। मुझे अपने उपदेशक स्वभाव पर शर्म आ रही थी। लगता था-उसने मुझे बख्श दिया, वरना..अपना तो राम नाम सत्य निश्चित हो गया था।







