बृहस्पतिवार, 27 जनवरी 2011

पर उपदेस कुशल बहुतेरे


पिछले दिनों तबीयत ठीक न थी। डॉक्टर के पास गया। सारे परीक्षण के बाद डॉक्टर ने नाडी पकडने की औपचारिकता निभाते हुए प्रश्न किया, आप सुबह कितने बजे उठते हैं?
मन था कि कह दूं, टेस्ट कराने में चार हजार खर्चने के बाद तो दो दिन से नींद ही नहीं आ रही! फिर भी अंदाजन कहा, यही कोई छ:-साढे छ: बजे। थोडा जल्दी सोया करें और सुबह 4 से 5 के बीच उठकर कसरत वगैरह किया करें।
जी.. मैंने समर्थन में सिर हिलाया। वैसे इस उम्र में योगा करना बेहतर है। जी.. मेरी नजरों में उनकी जड से आधी सफेद आधी काली खिजाबी मूंछें चुभ गई। आपको फलों का रस और हरी पत्तेदार सब्िजयां लेनी चाहिए।

जी हां, लेकिन.. मुझे डॉक्टर किसी उपदेशक सा लगने लगा था। वे कहते गए, आप चिंता न करें, मैंने टॉनिक लिख दिया है, आप ठीक हो जाएंगे। कोई टेंशन न पालें, प्रसन्न रहें और..। लेकिन डॉक्टर साहब मुझे हुआ क्या है? मैंने उनकी बात बीच में काटते हुए पूछा। कुछ नहीं, आप जरा अंडरवेट हैं, डॉक्टर ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा।

मैं हतप्रभ था। मैं सोचने लगा-मैं तो वर्षो से ऐसा ही था, एकदम फिक्स्ड वेट। दो-चार सौ ग्राम कम या ज्यादा। चार हजार के टेस्ट गए पानी में। जेब भी अंडरवेट यानी हलकी हो गई। डॉक्टर कहता है कुछ नहीं! मैंने क्रोध और हताशा की मिली-जुली मुद्रा में डॉक्टर को देखा। उनकी सींकिया बॉडी वर्षो से ऐसी ही थी, वैसे डॉक्टर साब, अंडरवेट तो आप भी हैं, मेरी जुबान से यह जवाब फूट पडा।

हें-हें..वो..क्या है कि मेरी तबीयत जरा ठीक नहीं रहती, डॉक्टर का यह उत्तर सुनकर मुझे लगा उनके उपदेश उन्हें ही दोहरा दूं। परंतु क्या करता! पर उपदेश कुशल बहुतेरे। ख्ौर। उपदेश देना सबको अच्छा लगता है। यूं तो मैं बचपन से उपदेशी जीव रहा। उपदेश देना हमें खूब आता है। यह एक आसान काम है, लेकिन ये सबके बस की बात नहीं। यह काम जोखिम भरा है। कई धर्मग्रंथ उपदेशों से भरे पडे हैं-हे मेरे पुत्र मेरी शिक्षा को न भूलना। अपने हृदय में मेरे उपदेशों को रखे रहना। ऐसा करने से तेरी आयु बढेगी और तू कुशल से रहेगा। कृपा और सच्चाई तुझसे अलग न होने पाए, वरन उनको अपने गले का हार बनाना। तो तू परमेश्वर और मनुष्य दोनों का अनुग्रह पाएगा। तू अति बुद्धिमान होगा।

हम मनुष्य प्रजाति के तथाकथित पुत्र ज्यादा बुद्धिमान निकले। उस महान उपदेशक को हमारे पापों के लिए सूली पर चढा दिया गया। इसलिए मैं कहता हूं कि यह काम जोखिम भरा है। क्योंकि सुनने वाले की उपस्थिति इसकी पहली शर्त है। उपदेशों को सुनने वाला चाहिए। उपदेश दीवारों को नहीं दिए जाते। इसलिए उपदेश देना एक आसान, किंतु जोखिम भरा काम है।

उपदेशक को यह जान लेना चाहिए कि सामने वाला सुनने को तैयार है या नहीं। सुनने के लिए धैर्य चाहिए। आज धैर्य की बेहद कमी है। वैसे लाचारी भी आदमी को धैर्यवान बनाती है। इसलिए अपने से कमजोरों को उपदेश देना प्रचलन में है। अधिकारी अपने अधीनस्थों को समय पर डयूटी पर आने का उपदेश देता है और खुद समय को गुलाम समझता है।

शर्मा जी मेरे अभिन्न मित्र हैं। एक दिन वह नए पडोसी से झगड पडे। पहलवाननुमा पडोसी गरजता हुआ बाहर आया तो उसका यह रूप देखते ही मेरे मित्र की हालत खराब हो गई। उन्होंने मेरा हाथ पकडते हुए मुझे ही उपदेश देना शुरू कर दिया, अरे छोडो भी, ऐसे लोगों के मुंह क्या लगना। सभ्यता भी कोई चीज होती है। झगडा तो हम भी कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करना शोभा नहीं देता।

उनकी दीनता ने उन्हें उपदेशक बना दिया था। तथापि उपदेश देने वाला उपदेश देता तभी है जब उसका फायदा हो। फायदे की दुनिया है। उपदेश देने से अपना उल्लू सीधा होता हो तो क्या बात है। किंतु दूसरे का फायदा! किसी को बर्दाश्त नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूं-इस काम में बहुत खतरा है, सिर फुटौवल के लिए तैयार हो तो उपदेश दो। अब इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए उपदेशों को लिख देने का तरीका निकाल लिया गया है। हितोपदेश की कथाएं आज भी दिशा दे रही हैं। अब उपदेश देना आत्मघाती है, इसलिए लिखकर रख दो बाकी पढने वाले की मर्जी।

बावजूद इसके परंपरागत तरीके से यानी आमने-सामने होकर उपदेश देना अभी चलन से बाहर नहीं हुआ है। अभी भी लोग यह जोिखम मोल ले लेते हैं। इस भीषण कलियुग में उपदेश देने की सनातन परंपरा जीवित है। बस जरा स्वरूप का फर्कहै। जोखिम उठाने के लिए हथियारों से लैस होना पडता है। श्री राम धनुष-बाण लेकर वन को गए। कृष्ण ने चक्र धरा। आज के उपदेशी जीव उपदेशों से कमा खा रहे हैं। अंगरक्षक उनकी निगरानी करते हैं। उनके उपदेशों को सुनने के लिए लोग हजारों रुपये खर्च करते हैं। माया महाठगिनि हम जानी.. यह उपदेश देने वाले करोडों में खेल रहे हैं। अर्थ के लिए ही उपदेश देना एक कला के रूप में विकसित हो रहा है। सच पूछिए तो कुशलता से उपदेश देना किसी कला से कमतर नहीं। आज नई पीढी के कुछ लोग बाकायदा इसकी शिक्षा-दीक्षा दे रहे हैं। वरना स्थिति तो यह है कि उपदेश तो क्या, आजकल आम बात तक किसी की कोई सुनना नहीं चाहता। युवा बेटा सीना तानकर बाप से कह देता है कि आप बात-बात पर उपदेश न दिया करें। जमाना बदल गया है, खुद को बदलें। फिल्म दर्शकों ने उपदेश देने वाली फिल्मों को नकार दिया-क्या वही सडी-गली बातें। सच बोलो, दूसरे को तकलीफ मत दो, कर भला तो हो भला। छि:।

उपदेशक फिल्में बेअसर हो रही हैं। अब सच्चे उपदेशों का असर नहीं होता। कथनी और करनी के फर्क से असर जाता रहा। कहा हुआ करना अब आउट ऑफ फैशन हो चुका है। कहो कुछ भी, पर करो वह जो मन पडे। कवि नईम के शब्दों में-
प्रश्न चिह्न क्यों लगा रहे, कथनी-करनी पर
इतनी जल्दी क्यों आ जाते, तुम अपनी पर।
अब ऐसे लोग दो खेमों में बंट गए हैं। कहने वाला उपदेशक और करने वाला श्रोता। उपदेशक कहता चलता, श्रोता बगलें झांक लेता है। हरिओम्। प्रवचनों की चाशनी में उपदेश का तीखापन कम हो जाता है तथा सुनने वाले की मारक क्षमता घटती है। फिर खर्च करने के बाद वसूलने की परंपरा भी तो है। लोग इस कान से सुनकर उस कान से निकालते हुए वसूलते हैं। कुछ दिनों पूर्व भारी भीड उमडी। मेरी इच्छा हुई कि मैं भी सुनूं। अपनी स्कूटर से सडक के किनारे-किनारे चला जा रहा था। मैं यातायात के नियमानुसार बाई तरफ था। तभी सामने से एक मोटरसाइकिल सवार लहराते हुए प्रकट हुआ और मेरी स्कूटर से भिडंत हो गई। मैं गिर गया।

अरे..अरे..अंकल जी गिर पडे..दौडो-दौडो आसपास के लोग दया भाव दिखाते हुए दौड पडे। मुझे अंदरूनी चोटें आई थीं। लोगों ने मुझे उठाया। मैं घबरा गया था। अपने आपको किसी तरह संभाला। स्कूटर न चलने की स्थिति में आ गया था। अत: गुस्सा दिखाते हुए कहा, कैसे गाडी चलाते हो। इतनी तेज। और वो भी रॉन्ग साइड। कुछ तो ध्यान करो। रोड पर चलने के कुछ नियम हैं। अरे जीवन के कुछ साल और बचे हैं..जी लेने दो।

नौजवान मोटरसाइकिल सवार रितिक रोशन की तरह कंधे उछालते हुए खडा हुआ। फिर मोटरसाइकिल पर किक जमाते हुए दम दे डाली, ठीक है..ठीक है, ज्यादा उपदेश झाडने की जरूरत नहीं। मर तो नहीं गए न। ये कहो बच गए। चलो निकल लो। मैं औंधे मुंह पडे स्कूटर देखता रह गया। वह फुर्र हो गया। मुझे अपने उपदेशक स्वभाव पर शर्म आ रही थी। लगता था-उसने मुझे बख्श दिया, वरना..अपना तो राम नाम सत्य निश्चित हो गया था।
[राकेश सोहम्]

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

रेत के महल

समुद्र के किनारे
एक लहर के
इंतज़ार में
रेत के महल
बना लिए थे
और
लहर के आते ही
वे ढह गए !

[] राकेश 'सोहम'

सोमवार, 22 मार्च 2010

आज 22 मार्च अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस

महामंत्र - वायु जल सर्वत्र हो शुभ गंध को धारण किये
- राकेश 'सोहम' -

22 मार्च ! अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस !! इस अवसर पर मुझे अपनी कविता की कुछ पंग्तियाँ याद आतीं हैं -

भीषण पर्यावरण प्रदूषण
दीख रहा प्रत्यक्ष ।
चेतें , जागें , लें संकल्प,
घर-घर लगाएं वृक्ष । ।

इन पंग्तियों में दो शब्द अति-महत्वपूर्ण हैं - 'चेतें' और 'जागें' । इन शब्दों का गूढ़ अर्थ कुछ यों होता है । 'चेतें' यानी जानकारी , 'जागें' मतलब पूरी जानकारी ।

मैं एक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान में मुलाजिम हूँ । यहाँ पर अधिकारी , कर्मचारी , औद्योगिक कामगार और मजदूर वर्ग के लोग कार्य करते हैं । इनमें अंगूठा छाप से लेकर उच्च - शिक्षित वर्ग के लोग शामिल हैं । जिनकी आयु 20 से 55 वर्ष से ऊपर की है । कुल मिलाकर ये पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं । ऐसा माना जा सकता है ।

पिछले दिनों 'नेशनल - सेफ्टी - कौंसिल' के दिशा निर्देश पर औद्योगिक संरक्षा पर साप्ताहिक आयोजन किया गया । इस आयोजन में एक 'संरक्षा - क्विज़' भी रखा गया । जिसमें सभी वर्ग के लगभग 500 लोगों ने भाग लिया ।

संरक्षा और सुरक्षा को वृहद् रूप देने की मंशा से मैंने बतौर क्विज़ मास्टर मुख्य रूप से दो प्रश्न रखे । पहला - क्या पालीथीन की थैलियाँ पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक हैं ? इस प्रश्न के ज़वाब में लगभग 90-95 प्रतिशत का ज़वाब 'हाँ' में था । वे मानते हैं कि पालीथीन की थैलियाँ उपयोग में नहीं लायीं जाना चाहिए ।

आश्चर्यजनक रूप से शेष लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उलटे प्रश् कर डाला - 'इसमें क्या बुराई है ? हम तो रोज़ पन्नियों का उपयोग करते हैं !'

इस प्रश्न के ज़वाब से ये माना जा सकता है कि अधिकतर लोगों को मात्र जानकारी है । पालीथीन या पन्नियों का प्रयोग करना चाहिए । यह वाक्य एक नारे के रूप में प्रचारित हुआ है, बस ! !

इस क्विज़ का दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न लोगों को कठिन बन पडा । इसमें पढ़े-लिखे आज के युवा भी भटक गए । मैंने प्लाटिक [नान-टेरेबिल] और कागज़ के दो विजिटिंग कार्ड दिखाकर प्रश्न पूछा - इन दो विजिटिंग कार्डस में से कौन सा कार्ड पर्यावरण कि दृष्टि से ठीक है ? अधिकतर लगभग 98-99 प्रतिशत लोगों ने प्लास्टिक के कार्ड को चुना !!

उक्त दो प्रश्नों के ज़वाब से एक बात उभरकर सामने आती है कि आम -जनता 'पन्नियों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए' को एक नारे के रूप में जानती है । उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं कि प्लास्टिक से बनी अन्य वस्तुएं भी पर्यावरण के लिए नुक्सान पहुंचा रहीं हैं ।

कुल मिलाकर आम-जनता को जानकारी तो है । पूरी जानकारी नहीं !यही बात जल को लेकर भी कही जा सकती है । 'जल ही जीवन है !' इसे जनता नारे के रूप में जानती और समझती है । लेकिन जल संरक्षण क्यों, इसका अभाव है ?

तभी जबलपुर शहर जिसे ताल-तलैयों और जलाशयों का शहर माना जाता है, आज जलाभाव से गुज़र रहा है ! यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने वाला जल गायब है । भू-जलस्तर नीचे चला गया है । कामोबेश यही स्थिति पूरे देश के शहरों की है । यहाँ की स्थानीय प्रशासनिक लचर नीतियों के चलते पानी से लबरेज़ अधिकतर ताल - तलैयों को पूरकर कालोनियां विकसित की जा रहीं हैं । जलाशयों को बचाकर विकसित करने की कोई योजना फिलहाल दूर-दूर तक नज़र नहीं आती ?

क्या आम जनता और प्रशासन केवल नारे उच्चारती रहेगी ? आम नागरिक कब जागेगा ?? क्या कोई योजना सामने आएगी ???

अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस पर मैं तो यही महामंत्र जपूंगा - ' वायु जल सर्वत्र हो शुभ गंध को धारण किये ' सर्वांत जल ही जीवन है ..ये मानो ..जल को जल के जैसे !

बृहस्पतिवार, 18 मार्च 2010

श श...माय नेम इस कान !


कान, नाक एवं गला विशेषज्ञों की दो दिवसीय कार्यशाला विगत सप्ताह जबलपुर शहर के गवर्नमेंट नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कालेज में संपन्न हुई । प्रतिष्ठित व ख्यातिलब्ध ई एन टी विशेषज्ञों ने बधिरों की जटिल शल्य चिकित्सा की । इस आयोजन में यह बात साफ़ तौर से चर्चा में रही कि जन्मजात बधिरों को छोड़कर 80 से 90 प्रतिशत मामलों में आंशिक या पूरी तौर से बहरेपन का मूल कारण ध्वनि-प्रदूषण है । हालांकि डॉक्टर इस बात कि ख़ुशी व्यक्त कर रहे हैं कि बहरेपन की समस्या से निजात पाना अब सम्भव हो गया है । काक्लियर इम्प्लांट अभी काफी मंहगी तकनीक है । आनेवाले समय मैं यह आम आदमी की पंहुच में आ जायेगी और उनका बहरापन मात्र 4 से 6 लाख में दूर किया जा सकेगा !!


अभी कल की बात है । मैं अपनी पत्नी जी को लेकर स्कूटर से बाज़ार जा रहा था । भीड़ भरी सड़क पर पीछे से आने वाला मोटर-साइकल सवार लगातार हार्न दे रहा था । मुद्दा ये नहीं है कि वह हार्न क्यों दे रहा था ! बल्कि सवाल ये है कि राह पर वाहन चलाते हुए हमने कितनी बार अनावश्यक हार्न बजाया ? क्या हम केवल शौक़ के लिए हार्न बजाते हैं ? क्या हम अनावश्यक ध्यानाकर्षण के लिए हार्न बजाते हैं ? अपने आप का आकलन करें ।


आज जबलपुर शहर में लगभग साढ़े चार लाख वाहन हैं । इनकी संख्या दिन-ब-दिन बढती जा रही है । शहरी विकास की गति इतनी धीमी है कि सड़कें यथावत संकरी की संकरी हैं ? दूसरी ओर बैंकों और ऋण मुहैया कराने वाले संस्थानों ने हर तबके के लोगों को वाहन थमा दिया है । सड़कों पर वाहनों का दवाब बढ़ रहा है । असामाजिक तत्व और आज के युवा खाली सड़क पर लगातार हार्न की बटन पर अंगूठा रखे फर्राटा मारते रहते हैं । उन्होंने दो-पहिया वाहनों में न न प्रकार के हार्न लगा रखे हैं । ये हार्न का बटन दबाने पर तो बजते ही हैं, ब्रेक पर पैर रखने से भी विचित्र ध्वनी के साथ बज उठते हैं !

ऐसे कान-फाडू शोर से पत्नी जी के सिर में दर्द होने लगता है । उन्होंने अपने कान को हथेली से ढँक लिया और मेरे कान के पास मुंह लाकर कहा, ' स्कूटर रोककर पीछे वाले वाहन चालक को रास्ता दे दो । कामोवेश हर सभ्य नागरिक की यही स्थिति है । वह हमारे चारों ओर फैले शोर को रास्ता दे रहा है । शादी-व्याह, तीज-त्यौहार, पूजा-अर्चन या फिर कोई आयोजन के नाम पर ध्वनी विस्तारक यंत्र भोंपू के सामान प्रदूषण फैलाते रहते हैं । हम अपनी सभ्यता की आड़ में दरवाज़ा बंद कर लेते हैं ?


मैं यहाँ वे आंकड़े नहीं दूंगा कि कितने डेसिबल की ध्वनि कानों के लिए घातक है या कितनी काम ध्वानि केवल कुत्ता ही सुन सकता है, हम नहीं ! मैं यहाँ आज की आधुनिक सभ्यता से प्रश्न करना चाहता हूँ - क्या हम सुधरेंगे ? क्या प्रशासन कोई ऐसा ठोस कानून लाएगा जिससे ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश लग सके ?? आम सभ्य जन और प्रशासन कब तक बधिरों की नाई निष्क्रिय बने रहेंगे ??? हमें स्वयं अनावश्यक ध्वनि विस्तारक यंत्रों के प्रयोग कम करने होंगे । हम सुधरेंगे तो युग सुधरेगा ।


हम देर रात कालोनी लौटे । घर के सामने स्कूटर बंद करने के पहले आदतन स्कूटर का हार्न बजाने जा रहा था ताकि घर के अन्दर बच्चे जाग जाएँ । लेकिन पत्नी जी ने मना कर दिया और घर की इलेक्ट्रोनिक डोर बेल का बटन दबा दिया । ...ॐ शान्तिः ॥शान्तिः ॥शान्तिः ...का कर्णप्रिय मंद स्वर घर के अन्दर से तैरता हुआ मेरे कानों तक पहुंचा और कानों ने जैसे हौले से कहा - ' श्श्श ...माय नेम इज कान !! MY NAME IS KAAN'


[] राकेश 'सोहम'


सोमवार, 8 मार्च 2010

विश्व महिला दिवस का अवशेष !

कल था
महिला दिवस पर
अखबारों में
विशेष,
दिवस गया
आज फिर
महिला
रह गयी
शेष !

आज से
उस कल तक
अखबारों में
बिखरेगी -
महिला, महिला
और महिला ।

महिला का शोषण,
महिला का कुपोषण ।

महिला पर अत्याचार,
महिला का बलात्कार ।

महिला का आकर्षण,
महिला का चीरहरण ।

महिला का दमन,
महिला का दहन ।

चटखारों में होगी
व्यथा,
बस और केवल बस
निर्बला होने की
कथा !!!
[] राकेश 'सोहम'

शनिवार, 20 फरवरी 2010

रंग भए रंग


होली के रंगों से
गोरी सजी आज,
गाल गुलाबी हुए
होंठ भए लाल ।

चुनरिया, घाघरिया
खूब रंगी रंग,
अंगों पे रंग सजे
रंग भए रंग ।

आँखें भी प्यारी लगीं
नीली सी आज,
वे भी तो रीती नहीं
रंगों से आज ।

[] राकेश 'सोहम'


बृहस्पतिवार, 17 दिसम्बर 2009

बोया पेड़ बबूल का !!

इधर चुनावी सरगर्मी बढ़ गयी । उधर खेत गेंहू की खेती के लिए तैयार हो गए । इधर हाँ वोट डालकर निपटे । उधर सचनूखेत में बीज डालकर बुआई कर आया । इधर जनता प्रतीक्षा करने लगी है चुनाव परिणाम की । उत्थान की । उधर सचनू सपने देखने लगा है की फसल आएगी । खेत लहलहा उठेंगे । उसकी मेहनत रंग लाएगी । मेहनत सफल हो जाएगी । उसके द्वारा डाले गए एक-एक बीज सैकड़ों और हजारों में फलित होंगे । उसकी दरिद्रता दूर हो जाएगी । वो विकास की राह पर निकल पड़ेगा ।


सचनू सच में एक सच्चा और भोला किसान है । जथा नाम तथा गुण । जैसा नाम वैसे गुण । उसका भोलापन बनावटी नहीं है । भोलेपन में सच्चाई होती है । बच्चों का भोलापन उन्हें सच बोलना सिखाता है । मेरा बेटा अवांछित टेलीफोन कॉल के उत्तर में कह देता है - पापा कह रहे हैं की पापा घर पर नहीं हैं, कहीं गए हैं । भोलापन हो तो बनावट बिगड़ जाती है , सच्चाई उजागर हो जाती है ।


अब सच्चा दिखने के लिए भोलापन ओढ़ना पड़ता है । चुनावी दौर में कई प्रत्याशी भोलेपन का लबादा ओढ़े दिखे । मोहल्ले पड़ोस की बुज़ुर्ग महिलाओं के पैरों पर मचलते नज़र आये । झोपड़-पट्टी में बसने वाली दरिद्र माँओं का आशीर्वाद लिया । इनकी भीड़ में शामिल पिछलग्गू छुटभैये इन माँओं को समझा रहे थे । सिर्फ आशीष से काम न चलेगा । वोट डालना पड़ेगा । कुछ विपक्षी तो यह भी कह रहे थे कि उनकी अपनी मां से नहीं पटती । सो अपनी मां को बेदखल कर दिया है । तभी अन्य माओं के प्रति प्रेम उमड़ आया है ।


खैर ! सचनू मेरा लंगोटिया यार है । परसाई जी के जमाने में चड्डी यार हुआ करते थे । अब ढीले-ढाले बरमूडा का ज़माना है । इस जमाने में लंगोटिया यार नहीं, बरमूडा यार होए हैं । बरमूडा यारी बरमूडा कि तरह ढीली होती है । इधर हमारी यारी अब भी लंगोटी की तरह सख्त है । मजबूती के साथ बंधी है । एकदम सच्ची है । सच्ची इसलिए क्योंकि हमने गाँव में सचनू के साथ एक धोती के दो टुकडे करके आधी-आधी पहनी है । ये बात और है कि मैं अब शहर चला आया हूँ । वो अब भी वैसा ही है । एक लम्बी धोती के दो टुकडे करके पहनने वाला । कमर थोड़ी झुक गयी है और लाठी लेकर चलता है । उसकी लाठी सुरक्षा के लिए है । टखनों के ऊपर से धोती शुरू होती है और पेट पर नाभि तक पहुँचते - पहुँचते समाप्त हो जाती है । शेष अस्सी प्रतिशत बदन नंगा का नंगा ।

सचनू पिछले दिनों शहर आया था । खाद और बीज लेने । चार दिनों तक भटकता रहा । एक दिन बस स्टेंड पर सोते मिल गया । मैं उसे घर ले आया । विकास की प्रतीक घर की बेजान सजावटी वस्तुओं और घर के सदस्यों में पसरी आधुनिक मानसिकता के बीच वह बड़ी अड़चन में रहा । भोजन इत्यादि से निपटने के बाद मैंने उससे पूछा -' और कैसे हो सचनू ? ' 'ठीक हूँ बाबू' - उसके द्वारा दिया गया बाबू संबोधन मेरे लिए नया था । वैसे उन दिनों मुझे रक्कू कहकर बुलाता था । बाबू में से जी हटाकर उसने अपनी मित्रता का परिचय दिया था । सचनू शहरी भाषा का प्रयोग खूब कर लेता था ।

चुनाव पास आ रहे थे । हर ओर चुनाव की चर्च थी । छोटे-बड़े सब चुनाव पर बात करते नज़र आते थे । इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने बात को आगे बढ़ने की गरज से सचनू को छेड़ा - ओर गाँव में क्या माहौल है ? मैने सोचा वो गाँव के चुनावी माहौल का बखान करेगा । लेकिन वह सर झुकाए पैर की बिंवाइयों से कीचड को कुरेदते हुए बोला - 'गाँव तक पहुँचने की सड़क पक्की हो जाती तो अच्छा होता । कीचड इतना है कि हे राम ! ऊपर से दिन भर बिजली नहीं रहती ?' उसने मेरे बैठक में लगे फानूस के झिलमिलाते एक से अधिक बल्बों पर नज़र घुमाई जो दिन में भी जल रहे थे । सचनू चुनाव से जैसे बेखबर था ।

यहाँ शहर में बड़े-बड़े मंच सजे थे । उन पर सैकड़ों बल्ब झिलमिला रहे थे । चुनावी आम सभाएं आयोजित हो रहीं थीं । ऐसी सभाओं के लिए भीड़ खरीदी जा रही थी । वहीं मेरे घर में काम वाली बाई पिछले एक सप्ताह से गायब थी । एक दिन चुनावी सभा में मिल गयी । उसने कहा कि वह चुनावी सभाओं में व्यस्त है ! मैं उसे, महीने भर के काम के लिए 150 रूपये देता था । उधर वो प्रति सभा 100 रुपया कमा रही थी । वह किसी-किसी रोज तो दो सभाएं अटेंड करती थी

बाहर गली से ढोल-ढमाकों का शोर सुनाई दिया । चुनावी मुनादी से मैं पुनः चैतन्य हो उठा । एक जागरूक मतदाता कि तरह । इस बार मैंने पूछा - 'सचनू, बाल-बच्चे क्या कर रहे हैं ?' 'खेती-बाड़ी ।' 'और पढाई लिखाई ?' ' उंहु ', इस बार उसने अपनी खोपड़ी पर हाथ फेरते हुए संक्षिप्त -सा उत्तर दिया . 'क्यों , उन्हें पाठशाला क्यों नहीं भेजा ?' ' नाम लिखाया था लेकिन ढोर-बछेरू के दर से स्कूल जाना बंद कर दिया .' मैं अवाक सचनू की ओर देखने लगा - 'अरे ढोर-बछेरू तो तेरे घर में हैं .' मवेशियों का पाठशाला से सम्बन्ध मेरी बुद्धि से परे था . ' नहीं बाबू वो बात नहीं है . उन्हें पाठशाला के अन्दर घूमते आवारा ढोर-बछेरू से दर लगता था . सुबह पाठशाला पहुँचो . पहले कक्षा में घुसे आवारा ढोर-बछेरू को हांककर भागो . फिर गोबर उठाकर सफाई करो तब जाकर पढाई .' बेशक, शिक्षा जानवरों को भी इंसान बनती है . जानवरों का पाठशाला प्रेम और क्लास अटेंड करने की सत्य कथा सचनू सुना गया .

मैं कुछ पूछता इसके पहले सचनू ने निर्णयात्मक बात कही - ' मैंने सोच बच्चे इतना काम घर में करेंगे तो काम का काम हो जायेगा और घर के घर में रहेंगे ।' मैं उसके निर्णय को नकार न सका . जिन्दगी का अनुभव किसी शिक्षा से कम नहीं . जाते-जाते मैंने उसे समझाया था - ' अच्छी फसल के लिए अच्छे बीज की पहचान होनी चाहिए, सचनू .' उधर गली में वोट किसको देना है इस पर विचार-विमर्श चल रहा था और सचनू विदा हो गया .

अगले चार-पांच माह सचनू की कोई खबर नहीं थी . चुनाव परिणाम आ चुके थे . जीते हुए प्रत्याशियों का शोर लंबी खामोशी में विलीन हो गया था . वादों के साथ बदलाव की बदली छंट हाई थी . सब कुछ वैसा ही चलने लगा . मंहगाई फिर अंगडाई लेने लगी . आशीर्वाद बांटने वाली मांओं की झोपड़ -पट्टी में भड़की आग शांत हो गयी थी . उसकी जगह एक आलिशान माल सर उठाने लगा था . रास्तों का ट्रेफिक और सघन हो गया था . कुछ दिनों से मैं घुटन महसूस कर रहा था . अतः सचनू के गाँव जा पहुंचा .

मेरी कार गाँव पहुंची तो सचनू रास्ते में मिल गया . वो खेत जा रहा था . मुझे देखते ही बोला - 'घर चलो बाबू .' मैनें मना कर दिया और जबरन उसे कार में बैठा लिया . शान्ति की तलाश में उसके खेत पर जा पहुंचा . मैं आश्चर्यचकित हुआ . उसके खेत में जगह-जगह बबूल के पेड़ उग आये थे . तभी सचनू ने निराश मन से कहा - 'बाबू आप ठीक कहे थे . हमें बीज की पहचान नहीं . बीज अच्छा नहीं था . कहीं दूर खेत की मेंढ पर बैठा गाँव का स्कूली छात्र किताब से सस्वर गा रहा था -

बोया पेड़ बबूल का , आम कहाँ से होय .
[प्रतिष्ठित वीकली पत्रिका 'शुक्रवार' जून '०९ में आखर-समग्र के अंतर्गत प्रकाशित]