शनिवार, 11 जुलाई 2009

भीगी कजरारी रात

सावन में घिर आई, भीगी कजरारी रात,
अंखियन समाय गई प्रियतम की याद ।

उपवन मन फूल खिला, अनुपम सा एक,
भंवरे संग झूम उठा सुगंधी बिखेर ।
सजनी समाय गयी प्रियतम की बांह,
सावन में घिर आई, भीगी कजरारी रात ।

भंवरे नें चूम लिया पंखुरियों का कम्पन,
फूल यों मदहोश हुआ झूम उठा उपवन ।
स्वांसन समाय गयी प्रियतम की स्वांस,
सावन में घिर आई भीगी कज़रारी रात ।
[] राकेश 'सोऽहं'

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