क्या बिटिया ग़लत राह पर चल पड़ी ?
'सुनो, पिंकी पर ज़रा ध्यान रखना, उसकी कॉपी किताबें चेक करते रहना ', मैंने पत्नी को आगाह किया ।
'अजी छोडो, मेरी बेटी है, मेरे संस्कार मिले हैं उसे, मुझे पूरा भरोसा है उस पर।', उन्होंने आडे हांथों लिया।
कुछ दिन बाद ....
पिंकी अभी अभी स्कूल के लिए निकली थी ।
'सुनिए, ये देखिये पिंकी की कॉपी से क्या निकला, दीपक का लव-लैटर । मैं जानती थी जैसा बाप-वैसी बेटी।', उन्होंने पूरा घर सर पर उठा मुझे कटघरे में ला खड़ा किया।
वह कागजी पुर्जा मुझे थमा दिया। पुर्जा अंग्रेज़ी में था, हस्ताक्षर स्पष्ट हिन्दी में थे - 'दीपक' । में चौंका ।
तभी पिंकी वापस आ गई, 'मम्मी जल्दी से दीपक की छुट्टी की ऍप्लिकेशन निकाल कर दे दो , मेरी कॉपी में राखी है। स्कूल बस आने वाली है । एक सहेली ने मुझे स्कूल में जमा करने के लिए दी थी और जल्दबाजी में भूल गई ।'
शीमती जी अवाक थीं।
कागजी पुर्जे पर घूमती मेरी नज़रों में भारिसा पुनः लौट आया और मैंने बिटिया को वह पुर्जा लौटाते हुए उसके गाल उमेंठ दिए।
शीमती जी की आंखों में भरोसा आंसू बनकर तिर आया।
[] राकेश 'सोऽहं'

आपकी पिता वाली कविता ने कहीं गहरा असर किया...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबजाए इस लघुकथा के...
हालांकि इसमें आपने हर माँ-बाप की सहज चिंताओं को बखूबी अभिव्यक्त किया है...पर पता नहीं ऐसा क्यूं लग रहा है कि थोडा सतही हो गया है...
अन्यथा ना लें...
एक नियमित पाठक जोड लिया है आपने...
आदरणीय रविकुमार रावतभाटा जी आप मेरे ब्लॉग के प्रथम ऐसे पाठक हैं जिन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी थी .
प्रत्युत्तर देंहटाएंआज आपने फिर अपनी बेबाक प्रतिक्रिया दी मुझे बेहद ख़ुशी हुई . आपकी कविताओं का कायल हूँ . पिछले दिनों एक साहित्यिक चर्चा के दौरान आपका ज़िक्र आया .
मेरी पत्रिका ब्लॉग में मेरी एक अलग ही मूड की कविता 'अनुबंध' पर भी कुछ कहें. आभार .