शनिवार, 11 जुलाई 2009

ज़िन्दगी में

ज़िन्दगी में कई बार मरा हूँ मैं,
कई बार मर-मरकर जिया हूँ मैं ।
तुम्हारी नज़रों ने भेदा है मुझे सदैव,
जाने कैसे अब तक जी रहा हूँ मैं ।
बिन पिए ही क़दम लड़खडाते हैं इस कदर,
तेरी आंखों से घूँट-घूँट पी रहा हूँ मैं ।
कितने ही वादे टूटे चरमराये हमारे बीच,
दिल के घावों को फ़िर भी सी रहा हूँ मैं ।

[] राकेश 'सोऽहं'

2 टिप्पणियाँ:

  1. आपकी कविताओं ने प्रभावित किया , खासकर “भीगी कजरारी रात” ने। बडी कोमल सी छुअन है इस गीत में । “वे” एक बडी सरल सी किंतु बेहद सम्वेदनशील कविता लगी।सचमुच ।

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  2. खूबसूरत कविताओं के रचयिता श्री रवि श्रीवास्तव जी ने अपनें ब्लॉग मेरी पत्रिका में लिखा है
    'आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
    राकेश जी, वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है।

    ...बिन पिए ही क़दम लड़खडाते हैं इस कदर,
    तेरी आंखों से घूँट-घूँट पी रहा हूँ मैं ।...

    आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे, बधाई स्वीकारें।
    आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...

    आप ने ऊपर जो तस्वीर लगा राखी है, उसमे मुझे बहुत कुछ दिखाई पडा....क्या यह चित्र चुनने का कोई ख़ास कारण है, या बस ऐसे ही??? ज़रूर बताइएगा.

    मैं उनका आभारी हूँ .

    राकेश 'सोऽहं'

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