शनिवार, 8 अगस्त 2009

तुमसे है अनुबंध
छंद अब,
तुम पर ही लिखूंगा;
महफ़िल है बेरंग
कुछ बातें
तुमसे ही कह लूँगा ।
तुम भावों कीचंचल सरिता
मैं शब्दों का सागर,
लिख दें गीतप्रेम के प्रिय तुम
मिल जाओ बस आकर ।
फूलों सा मकरंद
गीत मैं,
अधरों से पा लूँगा ।
तुम आशा की
भोर शबनामी
मैं राही भटका सा,
तुमसे मिलकर
राह मिल गयी
आया चैन ज़रा सा ।
मयखानों से तंग
छोडो अब,
आँखो से पी लूँगा ।
सूना घर
सूने गलियारे
सूना अग-जग सारा है,
याद तुम्हारी जीवन भर दे
तुमने मुझे संवारा है ।
कर आंखों को बंद
प्रर्तिपल नाम तुम्हारा लूँगा ।
[] राकेश 'सोऽहं'

2 टिप्पणियाँ:

  1. कुछ कहूं...
    चलिए कहता हूं कि कैसा अहसास हुआ एक पाठक की हैसीयत से...

    समान्यतयाः प्रथमतः गीत अच्छा लगा..
    भावों की बेहतर सुंदर छांदिक प्रस्तुति संभव हुई है..

    परंतु कथ्य पर थोडा प्रतिवाद है..
    गीत की शुरूआत में ही एक गहरा अंतर्विरोध सामने आता है...
    जो कि आपका मंतव्य कतई नहीं लगता...
    इतना सुंदर अनुबंध एक मजबूरी में लिया गया निर्णय सा लगने लगता है..जब आप आगे लिखते हैं कि..महफ़िल है बेरंग..कुछ बातें तुमसे ही कह लूंगा...यानि यदि महफ़िल बेरंग नहीं होती तो तुमसे कुछ बातें कहने की जरूरत भी नहीं थी...ऐसा भाव उभरता है..

    जाहिर है अब आगे की बातें अपना इच्छित प्रभाव खो देती हैं..

    इसी प्रसंग में एक और पक्ष भी रखना चाहूंगा...
    आपने फ़ैज़ की एक मशहूर नज़्म शायद पढी़ ही होगी...

    मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब ना मांग...

    इसी में वे ज़्यादा मशहूर पंक्तिया भी थी कि...
    और भी ग़म है जमाने में मुहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा....

    इस नज़्म में फ़ैज़ अपने वैयक्तिक घटाघोप से बाहर आकर अपनी मुहब्बत को जमाने तक विस्तार देते हैं...सामाजिक प्रतिबद्धता की राह दिखाते हैं...

    वहीं आपका गीत जमाने की बेरंगता से मोहभंग होकर, अपनी संवेदनशीलता को वैयक्तिक प्रेमालाप की ओर उन्मुखता दर्शाता है..
    वैयक्तिक आत्मकेन्द्रितता की राह दिखाता है...

    इस पर भी सोचियेगा...

    काफ़ी कह गया आलोचनापूर्वक...क्षमा चाहूंगा...
    अन्यथा ना लें...
    यदि कहीं से भी ध्यान देने योग्य ना लगे तो कृपया इसे भुला दें...

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  2. एक सिलसिले से जमाए गए शब्द समूह को कविता का नाम देना बेमानी है .

    शब्दों का आभाव, एक बार लिख कर, ये मान लेना कि बस हो गया. चिंतन कि गहराई तो है साध नहीं; मेरी कमजोरी है.

    कहना चाहता हूँ, असमर्थ पाता हूँ.

    आप जैसे गुनी साहित्यकारों के मार्गदर्शन से मुझमें उत्साह का संचार होता है.

    अब भी सीखनें की प्रक्रिया में हूँ.

    लिखी गई रचना पर आपका गहरा चिंतन और दिशा दर्शन से में अभिभूत हूँ.

    विगत दिनों पारिवारिक जिम्मेदारियों में संलग्न रहा और आपकी लंबी प्रतिक्रिया पाकर प्रसन्नता .

    पूर्ण विश्वास है, भविष्य में आपका इसी तरह प्रेम बना रहेगा.

    आपका ही -
    0 राकेश 'सोहम'

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