मंगलवार, 29 सितम्बर 2009

चिडिया और निर्माण : महाविनाश

मैं
चिंतित हूँ
बारूद और मिटटी के
दो ढेरों से
जो मेरे आँगन में
चुपके ही
कोई लगा गया है,
और चिंतित हूँ
इस सदी की
चिडिया से
जो रोज
उन ढेरों से लगी
पास वाली मुंडेर पर
आकर
बैठ जाती है,
और
चिहुकती है ।

उससे भी
कहीं ज्यादा
चिंतित हूँ
चिडिया की चोंच में दबे
निर्माण के उस बीज से
जिसमें छिपा है -
अमन और चैन का
छायादार विशाल वृक्ष
और
आग का गोला लिए
महाविनाश !

इस सदी की
चिडिया को
रोज आते-जाते
मैं देखता हूँ,
चोंच में
बीज दबाकर
जब भी वह
चिहुकती है
मैं
सहम जाता हूँ ?

आज वह चिडिया
फ़िर आई है
लेकिन
वह बीज
उसने गिरा दिया है
पता नहीं
किस ढेर में !!

मेरा मन
भयाक्रांत
हुआ जा रहा है
यह सोचकर कि
पता नहीं
किस ढेर में
गिरा हो वह बीज
और
अगली सदी में
क्या पनपे -
अमन व चैन का
छायादार विशाल वृक्ष
या
आग का गोला लिए
महाविनाश ?
०००००००००००
राकेश 'सोहम'

2 टिप्पणियाँ:

  1. बढ़िया जनाब...

    शायद नागार्जुन का, या त्रिलोचन का दोहा है:

    जले ठूंठ पर बैठ कर गई कोयलिया कूक
    बाल ना बांका कर सकी शासन की बंदूक

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं