शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

२६/११ और दिलों की दीवाली

मन की
कलमष अमावास में
दिलों के
भभकते दीये
ज़हर उगलती रूह
हाथों में थामे
बारूदी गोले ?

धूम-धड़के
खो गए
चींखें और धमाके हैं,
मानवता के हाथ
कुबेर ने
लाशों के ढेर
बांटे हैं !

जुए
फ़िर खेले जा रहे
द्रौपदी
फ़िर दांव गई,
मंहगाई की दौड़ में
गरीबी
हार गई ।

बहुत हुए दिन
रोज की
कहानी के,
और हम
राह देखेंगे
दिलों की
दीवाली के ।
००००००००००
[] राकेश 'सोहम'

3 टिप्पणियाँ:

  1. धूम-धड़के
    खो गए
    चींखें और धमाके हैं,
    मानवता के हाथ
    कुबेर ने
    लाशों के ढेर
    बांटे हैं !

    waah.....!!

    Bahut sunder....!!

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  2. बेहतरीन काव्याभिव्यक्ति...
    दूसरा पहलू क्या खूब उकेरा है आपने....

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  3. राकेश जी मेरा ई मेल पता यह है avinashvachaspati@gmail.com
    और बड़े छोटे न उम्र से होते हैं
    न होते हैं लिखने से
    सब बराबर ही होते हैं
    जो सबको बड़ा मानते हैं
    सच में बड़े वे ही होते हैं
    तो आप ही हुए बड़े
    क्‍योंकि आपने मुझे बड़ा माना है।

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