प्रेम-पत्र में
प्रेमिका की मंगनी
अन्यत्र
हो जाने की ख़बर
और अपने पास
बुला लेने की
विनती पढ़कर
प्रेमी सम्पादक रोया ।
पत्त्रोत्तर में
अभिवादन व खेद सहित
शब्दों को
कुछ यों पिरोया -
'हे प्रिये
अब तुम
मेरे लिए
मातृ एक सपना हो,
मैं तुम्हें
कैसे स्वीकारूँ
तुम तो एक
छपी हुई रचना हो !'
००००००००
राकेश 'सोहम'
मंगलवार, 3 नवम्बर 2009
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें