इस पड़ाव पर
मन के मरुथल में
तुम्हारी चाहत के
कमल खिल गए हैं ।
सोचता हूँ
छीन लूँगा तुम्हें
इस जमाने से ।
लेकिन
जब भी
ऐसा सोचता हूँ ,
बाँहें पूरे योवन से
फडफडा उठातीं हैं
मुट्ठियाँ
सख्त हो जातीं हैं और .......
और
उनमे दबा
साहस
सरकने लगता है !
सरकता ही जाता है
भुरभुरी
रेत की तरह !!
[] राकेश 'सोहम'
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आपकी रचनाओं और लेखन में एक लंबे समय का अनुभव साफ झलकता है. अच्छा लगता है आपको पढ़ना
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