बृहस्पतिवार, 17 दिसम्बर 2009

बोया पेड़ बबूल का !!

इधर चुनावी सरगर्मी बढ़ गयी । उधर खेत गेंहू की खेती के लिए तैयार हो गए । इधर हाँ वोट डालकर निपटे । उधर सचनूखेत में बीज डालकर बुआई कर आया । इधर जनता प्रतीक्षा करने लगी है चुनाव परिणाम की । उत्थान की । उधर सचनू सपने देखने लगा है की फसल आएगी । खेत लहलहा उठेंगे । उसकी मेहनत रंग लाएगी । मेहनत सफल हो जाएगी । उसके द्वारा डाले गए एक-एक बीज सैकड़ों और हजारों में फलित होंगे । उसकी दरिद्रता दूर हो जाएगी । वो विकास की राह पर निकल पड़ेगा ।


सचनू सच में एक सच्चा और भोला किसान है । जथा नाम तथा गुण । जैसा नाम वैसे गुण । उसका भोलापन बनावटी नहीं है । भोलेपन में सच्चाई होती है । बच्चों का भोलापन उन्हें सच बोलना सिखाता है । मेरा बेटा अवांछित टेलीफोन कॉल के उत्तर में कह देता है - पापा कह रहे हैं की पापा घर पर नहीं हैं, कहीं गए हैं । भोलापन हो तो बनावट बिगड़ जाती है , सच्चाई उजागर हो जाती है ।


अब सच्चा दिखने के लिए भोलापन ओढ़ना पड़ता है । चुनावी दौर में कई प्रत्याशी भोलेपन का लबादा ओढ़े दिखे । मोहल्ले पड़ोस की बुज़ुर्ग महिलाओं के पैरों पर मचलते नज़र आये । झोपड़-पट्टी में बसने वाली दरिद्र माँओं का आशीर्वाद लिया । इनकी भीड़ में शामिल पिछलग्गू छुटभैये इन माँओं को समझा रहे थे । सिर्फ आशीष से काम न चलेगा । वोट डालना पड़ेगा । कुछ विपक्षी तो यह भी कह रहे थे कि उनकी अपनी मां से नहीं पटती । सो अपनी मां को बेदखल कर दिया है । तभी अन्य माओं के प्रति प्रेम उमड़ आया है ।


खैर ! सचनू मेरा लंगोटिया यार है । परसाई जी के जमाने में चड्डी यार हुआ करते थे । अब ढीले-ढाले बरमूडा का ज़माना है । इस जमाने में लंगोटिया यार नहीं, बरमूडा यार होए हैं । बरमूडा यारी बरमूडा कि तरह ढीली होती है । इधर हमारी यारी अब भी लंगोटी की तरह सख्त है । मजबूती के साथ बंधी है । एकदम सच्ची है । सच्ची इसलिए क्योंकि हमने गाँव में सचनू के साथ एक धोती के दो टुकडे करके आधी-आधी पहनी है । ये बात और है कि मैं अब शहर चला आया हूँ । वो अब भी वैसा ही है । एक लम्बी धोती के दो टुकडे करके पहनने वाला । कमर थोड़ी झुक गयी है और लाठी लेकर चलता है । उसकी लाठी सुरक्षा के लिए है । टखनों के ऊपर से धोती शुरू होती है और पेट पर नाभि तक पहुँचते - पहुँचते समाप्त हो जाती है । शेष अस्सी प्रतिशत बदन नंगा का नंगा ।

सचनू पिछले दिनों शहर आया था । खाद और बीज लेने । चार दिनों तक भटकता रहा । एक दिन बस स्टेंड पर सोते मिल गया । मैं उसे घर ले आया । विकास की प्रतीक घर की बेजान सजावटी वस्तुओं और घर के सदस्यों में पसरी आधुनिक मानसिकता के बीच वह बड़ी अड़चन में रहा । भोजन इत्यादि से निपटने के बाद मैंने उससे पूछा -' और कैसे हो सचनू ? ' 'ठीक हूँ बाबू' - उसके द्वारा दिया गया बाबू संबोधन मेरे लिए नया था । वैसे उन दिनों मुझे रक्कू कहकर बुलाता था । बाबू में से जी हटाकर उसने अपनी मित्रता का परिचय दिया था । सचनू शहरी भाषा का प्रयोग खूब कर लेता था ।

चुनाव पास आ रहे थे । हर ओर चुनाव की चर्च थी । छोटे-बड़े सब चुनाव पर बात करते नज़र आते थे । इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने बात को आगे बढ़ने की गरज से सचनू को छेड़ा - ओर गाँव में क्या माहौल है ? मैने सोचा वो गाँव के चुनावी माहौल का बखान करेगा । लेकिन वह सर झुकाए पैर की बिंवाइयों से कीचड को कुरेदते हुए बोला - 'गाँव तक पहुँचने की सड़क पक्की हो जाती तो अच्छा होता । कीचड इतना है कि हे राम ! ऊपर से दिन भर बिजली नहीं रहती ?' उसने मेरे बैठक में लगे फानूस के झिलमिलाते एक से अधिक बल्बों पर नज़र घुमाई जो दिन में भी जल रहे थे । सचनू चुनाव से जैसे बेखबर था ।

यहाँ शहर में बड़े-बड़े मंच सजे थे । उन पर सैकड़ों बल्ब झिलमिला रहे थे । चुनावी आम सभाएं आयोजित हो रहीं थीं । ऐसी सभाओं के लिए भीड़ खरीदी जा रही थी । वहीं मेरे घर में काम वाली बाई पिछले एक सप्ताह से गायब थी । एक दिन चुनावी सभा में मिल गयी । उसने कहा कि वह चुनावी सभाओं में व्यस्त है ! मैं उसे, महीने भर के काम के लिए 150 रूपये देता था । उधर वो प्रति सभा 100 रुपया कमा रही थी । वह किसी-किसी रोज तो दो सभाएं अटेंड करती थी

बाहर गली से ढोल-ढमाकों का शोर सुनाई दिया । चुनावी मुनादी से मैं पुनः चैतन्य हो उठा । एक जागरूक मतदाता कि तरह । इस बार मैंने पूछा - 'सचनू, बाल-बच्चे क्या कर रहे हैं ?' 'खेती-बाड़ी ।' 'और पढाई लिखाई ?' ' उंहु ', इस बार उसने अपनी खोपड़ी पर हाथ फेरते हुए संक्षिप्त -सा उत्तर दिया . 'क्यों , उन्हें पाठशाला क्यों नहीं भेजा ?' ' नाम लिखाया था लेकिन ढोर-बछेरू के दर से स्कूल जाना बंद कर दिया .' मैं अवाक सचनू की ओर देखने लगा - 'अरे ढोर-बछेरू तो तेरे घर में हैं .' मवेशियों का पाठशाला से सम्बन्ध मेरी बुद्धि से परे था . ' नहीं बाबू वो बात नहीं है . उन्हें पाठशाला के अन्दर घूमते आवारा ढोर-बछेरू से दर लगता था . सुबह पाठशाला पहुँचो . पहले कक्षा में घुसे आवारा ढोर-बछेरू को हांककर भागो . फिर गोबर उठाकर सफाई करो तब जाकर पढाई .' बेशक, शिक्षा जानवरों को भी इंसान बनती है . जानवरों का पाठशाला प्रेम और क्लास अटेंड करने की सत्य कथा सचनू सुना गया .

मैं कुछ पूछता इसके पहले सचनू ने निर्णयात्मक बात कही - ' मैंने सोच बच्चे इतना काम घर में करेंगे तो काम का काम हो जायेगा और घर के घर में रहेंगे ।' मैं उसके निर्णय को नकार न सका . जिन्दगी का अनुभव किसी शिक्षा से कम नहीं . जाते-जाते मैंने उसे समझाया था - ' अच्छी फसल के लिए अच्छे बीज की पहचान होनी चाहिए, सचनू .' उधर गली में वोट किसको देना है इस पर विचार-विमर्श चल रहा था और सचनू विदा हो गया .

अगले चार-पांच माह सचनू की कोई खबर नहीं थी . चुनाव परिणाम आ चुके थे . जीते हुए प्रत्याशियों का शोर लंबी खामोशी में विलीन हो गया था . वादों के साथ बदलाव की बदली छंट हाई थी . सब कुछ वैसा ही चलने लगा . मंहगाई फिर अंगडाई लेने लगी . आशीर्वाद बांटने वाली मांओं की झोपड़ -पट्टी में भड़की आग शांत हो गयी थी . उसकी जगह एक आलिशान माल सर उठाने लगा था . रास्तों का ट्रेफिक और सघन हो गया था . कुछ दिनों से मैं घुटन महसूस कर रहा था . अतः सचनू के गाँव जा पहुंचा .

मेरी कार गाँव पहुंची तो सचनू रास्ते में मिल गया . वो खेत जा रहा था . मुझे देखते ही बोला - 'घर चलो बाबू .' मैनें मना कर दिया और जबरन उसे कार में बैठा लिया . शान्ति की तलाश में उसके खेत पर जा पहुंचा . मैं आश्चर्यचकित हुआ . उसके खेत में जगह-जगह बबूल के पेड़ उग आये थे . तभी सचनू ने निराश मन से कहा - 'बाबू आप ठीक कहे थे . हमें बीज की पहचान नहीं . बीज अच्छा नहीं था . कहीं दूर खेत की मेंढ पर बैठा गाँव का स्कूली छात्र किताब से सस्वर गा रहा था -

बोया पेड़ बबूल का , आम कहाँ से होय .
[प्रतिष्ठित वीकली पत्रिका 'शुक्रवार' जून '०९ में आखर-समग्र के अंतर्गत प्रकाशित]

4 टिप्पणियाँ:

  1. योगेन्द्र जी और रवि जी क्रमशः ग़ज़ल और कविता के अनूठे रचनाकारों को अपने ब्लॉग पर पाकर धन्य महसूस कर रहा हूँ . विश्वास है भविष्य में भी आशीर्वाद मिलता रहेगा.

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  2. Bahut khub..is tarah ki rachna kam hi dekhne ko milti hai..badhai.
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    शब्द-शिखर पर इस बार काला-पानी कहे जाने वाले "सेलुलर जेल" की यात्रा करें और आपने भावों से परिचित भी कराएँ.

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